असल मांजरा कुछ और है…

WolfLamb

वाकिफ नहीं हो पाए सब, दुष्टों की गहरी चाल से,
बस त्रस्त होते फिर रहे, मायावी के मायाजाल से !
जब तक है कतरा रक्त का ये, ये खून तब तक चूसेंगे,
आंखे न मूँदो तुम यहाँ, इस दावानल विकराल से !!
तुमने तो बस सत्ता बदली, पर चरित्र में तो चोर है,
व्यर्थ वाद में सब उलझे है, असल मांजरा कुछ और है !!

भ्रष्टाचार अब नही होगा, ये कह के जो आए है,
भ्रष्टाचार के प्रतिदिन वो, नए रिकॉर्ड बनाए है !
जनता को बहकाने में, साहेब भी पहुंची हस्ती है,
शेखचिल्ली भी उनके आगे, नतमस्तक हुए लजाए है !!
अब सरकार है ताकतवर, पर जनता हुई कमजोर है,
व्यर्थ वाद में सब उलझे है, असल मांजरा कुछ और है !!

हर ओर मातम पसरे है, कैसा है ये राम राज,
इस लोकतंत्र में जनता ही, बेबस लगती है आज !
भेड़ो ने जब सौंप दी सत्ता, भेड़ियों के ही हाथ ही में,
तो फिर कैसे न हो जिंदगी, खुशियों की मोहताज !!
जब तक न तुम ये मानोगे, होनी न तब तक भोर है !
व्यर्थ वाद में सब उलझे है, असल मांजरा कुछ और है !!

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अजीब रिवाज है….

Ajib riwaj

अजीब रिवाज खामखा लोग चिल्लाने लगते है,
बन के मकड़ी, रोज एक मासूम फंसाने लगते है !
तुम करो एकता की बात तो देशद्रोही कहे जाओगे,
खुद दंगा करके भी राष्ट्रभक्त कहलाने लगते है !!
अजीब रिवाज है, खामखा लोग चिल्लाने लगते है !!!

तुम जो कहो मैं भूखा हूँ, तो वो धर्म की गुहार लगाएंगे,
फिर भी जो न मानोगे, तो गैर मुल्क भिजवाएंगे !
तुम्हे विपक्षी पार्टी का समर्थक भी बताएँगे,
पर रोटी से भूख मिटेगी, ये बात नहीं दोहराएंगे !!
इस तरह से जनता को, बरगलाने लगते है
अजीब रिवाज है, खामखा लोग चिल्लाने लगते है !

गर मुस्लिमों से झगड़ा हो, तो तुम्हे हिन्दू बताएंगे,
और अगले ही दिन, दलित कह कर ठुकरायेंगे !
अपना काम बनाने को तुम्हे गले भी लगाएंगे,
पर जातिवाद और क्षेत्रवाद का विष भी फैलाएंगे !!
कितने ही एक पल भर में, ये किरदार निभाने लगते हैं !
अजीब रिवाज है, खामखा लोग चिल्लाने लगते है !!

बहस में तो इनका कोई सानी नहीं हैं,
क्यूंकि इनकी आँखों में, शर्म का पानी नहीं है,
कह देंगे कुछ भी, तुम्हे चुप करने के लिए,
क्योंकि मर्यादा कोई भी, इनको निभानी नहीं है !
गर किसी ने सच कह दिया, तो गरियाने लगते है,
अजीब रिवाज है, खामखा लोग चिल्लाने लगते है !!
अजीब रिवाज है, अजीब रिवाज है !!!

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तो फिर हमको दिक्कत है……

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तुम चाहे पत्थर पूजो, इससे हमको दिक्कत नहीं,
पर मानव भी पत्थर बन जाए, तो फिर हमको दिक्कत है !

तुम चादर चढ़ाओ मज़ारो पे, हमें इससे भी कोई दिक्कत नहीं,
गर कोई कपडे को तरसे, तो फिर हमको दिक्कत है !

तुम चर्च में जलाओ मोमबत्ती, हमें इससे भी कोई दिक्कत नहीं,
पर घर में पसरा अँधेरा हो, तो फिर हमको दिक्कत है !

तुम अन्न को फेंको नालों में, हमको इससे भी दिक्कत नहीं,
पर कोई भूख से मर जाए, तो फिर हमको दिक्कत है !

तुम ईमान को बेचो सड़को पर, हमको इससे भी दिक्कत नहीं,
गर देश को बेचने की सोचा, तो फिर हमको दिक्कत है !

तुम चाहे वहशी-उन्मादी बन जाओ, हमको इससे भी दिक्कत नहीं,
पर इससे कोई मासूम मरा, तो फिर हमको दिक्कत है !

तुम भर लो अपनी तिजौरी को, हमको इससे भी दिक्कत नहीं,
पर मजदूर-किसानों का जीवन, गर नर्क हुआ तो दिक्कत है !

तुम दान-दिखावा खूब करो, हमको इससे भी दिक्कत नहीं,
पर पैसों की खातिर कलियाँ, नीलाम हुई तो दिक्कत है !

तुम चाहे जितना भी ढोंग धरो, हमको इससे भी दिक्कत नहीं,
पर इन पाखंडो से जीवन, बर्बाद हुआ तो दिक्कत है !

……………संजीव कुमार……………

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हिटलर के नाती…

Hitlar ke nati.

खूनी प्यास बुझाने निकले, ये पागल आघाती हैं,
हस्र बुरे का बुरा ही होगा, समय यही दोहराती है !
तानाशाही सत्ता, जनता चूर करेगी पल-क्षण में,
कान खोल कर सुन ले सारे, ये जो हिटलर के नाती है !!

हिटलर ने जब राज किया तो, लोगों को बहकाया था,
धर्म-जात, मजहब में बांटा, लोगों को लड़वाया था !
उस दौर में जो भी बहके थे, वो कुछ समझ न पाए थे,
मानवता को भूल के सबने, खूनी कोहराम मचाया था !!
नरसंहार हुआ इस जग में, ये इतिहास बताती है,
कान खोल कर सुन ले सारे, ये जो हिटलर के नाती है !!

हिटलर की चालों को, चलने वाला जब भी आएगा,
प्रेम नहीं अपितु घृणा का, पात्र वो समझा जाएगा !
नफरत के जो बीज हैं बोए, वो नफरत ही काटेगा,
ये भी याद वो रख ले, हिटलर सा अंजाम ही पाएगा !!
काठ की हांड़ी कभी दुबारा, नहीं चढाई जाती है,
कान खोल कर सुन ले सारे, ये जो हिटलर के नाती है !!

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युवा आगे बढ़ कर आया है…..

Youth

युवाओं ने संघर्ष किया, युवाओं ने परचम लहराया है
बलिदानो की बेदी पर चढ़ कर, हर संकट से टकराया है !
हंस कर झूले हैं फांसी पर और सीने पर खाई गोली,
जब पड़ी जरुरत दुनिया को, युवा आगे बढ़ कर आया है !!

जब जब कमजोरों को जकड़ा, दहशत ने अपने चालों से,
और बहशी बन कर के दुष्टों ने, नारी को खींचा बालों से,
उस जोर जुल्म और दहशत से, जग में युवा टकराया है,
जब पड़ी जरुरत दुनिया को, युवा आगे बढ़ कर आया है !!

जब बात वतन की होती है, खुल कर हुंकार लगाते हैं,
गर आंच वतन पर आए तो, नदियों सा खून बहाते हैं !
महबूब वतन का बन कर के, दीवानापन दिखलाया है.
जब पड़ी जरुरत दुनिया को, युवा आगे बढ़ कर आया है !!

जब आस कहीं न टिकता है, जग में अँधियारा दिखता है,
इंसाफ बाजारों में बैठा, गाजर मूली सा बिकता है !
उस अंधियारे मंजर में भी, खुशियों का दीप जलाया है,
जब पड़ी जरुरत दुनिया को, युवा आगे बढ़ कर आया है !!

जीने की नई परिभाषा जग को, युवा ने ही सिखलाया है,
हर जात – क्षेत्र और मजहब के, लोगों को ये समझाया है !
मिलकर एक भारत बनता है, हर इंसां को बतलाया है,
जब पड़ी जरुरत दुनिया को, युवा आगे बढ़ कर आया है !!
युवा आगे बढ़ कर आया है, युवा आगे बढ़ कर आया है !!!

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(मंगल भवः – अब तक भारी पड़ा शनिचर, आज पड़ेगा मंगल रे…)

(मंगल भवः – अब तक भारी पड़ा शनिचर, आज पड़ेगा मंगल रे…)

हाथ जोड़ और पैर पकड़ कर, बहुत कर लिया तूने बात,
गर ऐसे ही बात बने तो, बिगड़े क्यों तेरे हालात !
छोड़ दे अब तू पाठ – भजन, जब छिड़ा हुआ है दंगल रे,
अब तक भारी पड़ा शनिचर, आज पड़ेगा मंगल रे… !!

सारी बातें तूने मानी, फिर भी रुकी न इनकी मनमानी,
चुप रह कर तूने सब झेला, बहता रहा आंख से पानी !
क्यूँ तूने चुप-चाप सहा, सब पूछेंगे तुझसे कल रे,
अब तक भारी पड़ा शनिचर, आज पड़ेगा मंगल रे…!!

जितने अत्याचार किये हैं, उसकी भरपाई अब होगी,
जिसने भी अन्याय किये है, उसकी रुसवाई अब होगी !
अत्याचारी थर्र थर्र कांपे, मचा दे ऐसी हलचल रे,
अब तक भारी पड़ा शनिचर, आज पड़ेगा मंगल रे…!!

क्यूँ मायूसी में तू रहा था, सारे सितम चुप चाप सहा था,
एक दिन ये उलझन सुलझेगी, तूने ही मेरे यार कहा था !
जितनी भी उलझन है तेरी, आज ही कर सारे हल रे,
अब तक भारी पड़ा शनिचर, आज पड़ेगा मंगल रे…!!
अब तक भारी पड़ा शनिचर, आज पड़ेगा मंगल रे…!!!

……संजीव कुमार……

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नारायण तेरा बल्ब जले रे घर घर में…

नारायण तेरा बल्ब जले रे घर घर में,
मिटाए अँधियारा जले ये जब में !
नारायण तेरा, नारायण तेरा,
नारायण तेरा बल्ब जले रे घर घर में !!

अंधियारों में रहते है सब,
जाने उजाला होयेगा कब ?
कोई तो इनको राह दिखाओ,
आस लगाए बैठे है सब !!
सारा अँधियारा मिट जाये,
कर दे कुछ ऐसा पल भर में !
नारायण तेरा, नारायण तेरा,
नारायण तेरा बल्ब जले रे घर घर में !!

मायूसी गावों के चेहरों पर,
उजियारा पसरा शहरों पर!
इनकी मायूसी जो हर ले,
कोई तो ऐसा यार जतन कर !!
सारे चेहरे खिल उठे,
खुशियां बस दिखे अंखियन में !
नारायण तेरा, नारायण तेरा,
नारायण तेरा बल्ब जले रे घर घर में !!

इनको तू पहचान दिला दे,
रोटी-कपडा-मकान दिला दे !
कोई नीच न समझे इनको,
ऐसा तू सम्मान दिला दे !!
स्वाभिमान से बीते जीवन,
एक सामान सब रहे नगर में !
नारायण तेरा, नारायण तेरा,
नारायण तेरा बल्ब जले रे घर घर में !!

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