समझो चुनाव आ गया….

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जब वर्षों के बाद तुम्हारी, झोपड़ी रोशनी से चमके,
जब कूड़ों की ढेर से भी, फूलों की खुशबु महके !
और जब कौएं से बदत्तर नेता, कोयल की भांति चहके,
समझो, चुनाव आ गया, समझो, चुनाव आ गया !!

जब तुमसे मिल के कोई नेता, बिना बात मुस्काने लगे,
साफ़ हो चुकी हैं जो गलियां, उन में झाड़ू लगाने लगे !
और जबरदस्ती शुभचिंतक बनने के भी स्वांग रचाने लगे,
समझो, चुनाव आ गया, समझो, चुनाव आ गया !!

जब देश की जनता को ये नेता, झूठा ख्वाब दिखाने लगे,
जब देशभक्त कहलाने के लिए, व्यर्थ ये लोग चिल्लाने लगे !
और जब इन नेताओं को, गरीबों की चिंता सताने लगे,
समझो, चुनाव आ गया, समझो, चुनाव आ गया !!

जब नेताओं के पकवान भी, टूटे-फूटे घर में बने,
जब नेताओं के पैर भी, दिखे कीचड़ से सने !
और जब सत्ता की खातिर, ये नेता बेचने लगे सपने,
समझो, चुनाव आ गया, समझो, चुनाव आ गया !!

जब भी ये बरसाती मेंढक, 5 साल में आएंगे,
फिर से सत्ता पाने के लिए, लोगों को बहकायेंगे !
गर ना माने तो धर्म-जात का, विष भी ये फैलाएंगे,
और लोग बहक के लड़ जाएं तो, समझो, चुनाव आ गया !!

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आखिर कब तक???..

Akhir Kab tak

कब तक बहकाएं जायेंगे हम, इन धर्मों के नाम पर,
कब तक उन्वाद मचाएंगें हम, इन धर्मों के नाम पर !

रक्त जो पसरा है सडकों पर, वो तेरा भी है मेरा भी,
कितना ख़ून बहाएंगे हम, इन धर्मों के नाम पर !

वहशी बन बैठे है दोनों, कुछ तू तो कुछ मैं भी,
कब तक होश गवाएंगें हम, इन धर्मों के नाम पर !

आग लगी है जिस बस्ती में, वो तेरा भी है मेरा भी,
कितने घर को जलाएंगे हम, इन धर्मों के नाम पर !

मंदिर टूटे या फिर मस्जिद, घर तो रब का टूटेगा,
कब तक रब को रुलायेंगे हम, इन धर्मों के नाम पर !

बच्चे भूख से बिलख रहे है, तेरे भी और मेरे भी,
कब तक सच को छिपाएंगे हम, इन धर्मों के नाम पर !

प्यार के भूखे दोनों है, तू भी है और मैं भी,
पर नफरत कब तक फैलाएंगे हम, इन धर्मों के नाम पर !

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इस दुनियां में हैं हम हारे…

“आज यहाँ इस चौराहे पर कैसे तुम्हें पुकारे,
लगता है कि हार गए हम, दिल के रिश्ते सारे !
चोट भी मुझको लगी तो उससे, जिसको अपना माना,
दिल को लगा सभी अपने, पर कोई नहीं हमारे !!”

ये दुनियां कि महफ़िल प्यारे,
इनमे हर पल हैं हम हारे !
यहाँ विश्वास किसी पर मत करना,
देंगें धोखा तुमको सारे !!

हमने भी तो की, ये ही ख़ता,
जोड़ा जो गैरों से नाता !
इस भूल की ही तो सजा मिली,
जो गम से जुड़ा मेरा रिश्ता !!
अब हो करके बर्बाद यहाँ,
हम पोंछ रहें आंसू सारे !
ये दुनियां कि महफ़िल प्यारे,
इनमे हर पल हैं हम हारे !!

था पागलपन का शौक हमें,
जो कूद पड़े इस मंजर में !
अब दिल बस तड़पाते है,
कसमों के सारे वो लम्हें !!
हम प्यार यहाँ पर करके तो,
कहलाने लगे अब आवारे !
ये दुनियां कि महफ़िल प्यारे,
इनमे हर पल हैं हम हारे !!

हम किसको यहाँ सच्चा माने,
लगते हैं झूठे सब अफ़साने !
हम खुद पर ही शर्मिंदा हैं,
जो गैरों को गए थे अपनाने !!
जब प्यार निभाने पहुंचे तो,
इस दुनियां ने ताने मारे !
ये दुनियां कि महफ़िल प्यारे,
इनमे हर पल हैं हम हारे !!

वो छोड़ गए बेगाने को,
ये जीवन दुःख में बिताने को !
कर गए तन्हा वीराने में,
बस घुट-घुट कर मर जाने को !!
उसने ही नहीं अपना माना,
हम दिल और जां जिन पर वारे !
ये दुनियां कि महफ़िल प्यारे,
इनमे हर पल हैं हम हारे !!
यहाँ विश्वास किसी पर मत करना,
देंगें धोखा तुमको सारे !!

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वज़ीर-ए-आलम की विदेश की यात्रा…

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गए वज़ीर-ए-आलम जब करने विदेश की यात्रा,
लाऊंगा तुम सब के लिए कुछ, बतला तो दो मात्रा !

ले आऊंगा कई जहाज और शक्तिशाली हथियार,
देख के जिनकी ताकत, शत्रु भी कांपेंगे यार !

ले आऊंगा पल में मीलों दौड़ने वाली गाड़ी,
ख़ुशी से जिमसे सफर करेंगी, मेरी जनता सारी !

मेरे वक्तव्यों से बजेगा, देश के नाम का डंका,
सब मिल कर जयकार करेंगे, क्या है कोई शंका ?

हमने बोला, ये तो ठीक है पर सुन लो सरकार,
पहले जनता की मूल-समस्या का तो करो उपचार !

क्यों आज भी लाखों आबादी, गन्दी बस्ती में रहती हैं,
क्यों मेहनतकश मजदुर देश में, ज्यातती सबकी सहती है ?

क्यों आज भी देश के लाखों बचे, फुटपाथों पर पलते है,
क्यों धर्म-जात के विषधर, देश में चौड़ी छाती कर चलते है ?

क्यों रोज़गार के लिए यहाँ पर, खड़े करोड़ों यार हैं,
क्यों शिक्षा और चिकित्सा का यहाँ, लगता नित बाजार है !

क्यों इस देश में आज भी भूख से सैकड़ों बच्चे मरते है,
क्यों धर्म के नाम पे अंधे हो सब, पागलों की तरह लड़ते है ?

पशु प्रेम में बहके ऐसे की ले रहे इंसानों की जान,
प्रेम से पशु तो बनते मानव, पर क्यों इन्सां हो रहे हैवान ?

मेरे मालिक तुम ही बतला दो, कब होगी ऐसी बिहान,
जहाँ जाति-धर्म और आमिर-गरीब सब हो एक सामान !

गर दे सकते हो दे दो, ये छोटा सा उपहार,
मिल जाये इस देश में सब को रोटी, कपडा और सत्कार !

गर कर सकते हो तो करवा दो शोषणमुक्त ये उपवन,
फिर न कभी यहाँ मुरझाये गरीबी में कोई जीवन !

सबको दे दो मुफ्त में शिक्षा और चिकित्सा का अधिकार,
यहाँ रहे न कोई बेरोजगार और न हो देश में कोई भ्रष्टाचार !

ला सको ये उम्मीद अगर, मेरे साहब सचमुच ले आना,
जब सब को सब मिल जाये तो फिर, कुछ के लिए कुछ ले आना !!

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मेरे भारत तू ही बता दे…

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मेरे भारत तू ही बता दे, धर्म बड़ा या कर्म बड़े !
एक ही गर ये सारे, तो फिर जाति-धर्म पे क्यों ये लड़े !!

मेरे भारत तू ही बता दे, कैसा देश हम तुझे कहे !
तुझको गर बोले धर्म- निरपेक्ष, तो फिर कुछ क्यों हिन्दू-राष्ट्र कहे !!

मेरे भारत तू ही बता दे, क्यों सब अत्याचार सहे !
एक है जब हम भारतवासी, तो फिर क्यों यहाँ मानव-रक्त बहे !!

मेरे भारत तू ही बता दे, कब ये सच को अपनायेंगे !
ढोंग पाखंड से मानव-मुक्ति, कब जा कर हम पाएंगे !!

मेरे भारत तू ही बता दे, कब हर मानव विज्ञान से नाता जोड़ेगा !
कब हक़ छिन जाने का ठिकड़ा, भाग्य पे हर कोई फोड़ेगा !!

मेरे भारत तू ही बता दे, कब तक, सत्ता पर लालच बैठेगा !
कब जा कर इस देश का बेटा, कुर्सी से इनको खींचेगा !!

मेरे भारत तू ही बता दे, कब तक झूठ ही जीतेगा !
कब जा कर इंसाफ के लिए, सदियों समय न बीतेगा !!

मेरे भारत तू ही बता दे, किस दिन नारी चैन से सोएगी !
कब तक वो इंसाफ की आस में, खून के आंसू रोएगी !!

मेरे भारत तू ही बता दे, कब तक ऐसा होएगा !
किसी के पास हो 10-10 महलें, कोई सडकों पर ही सोएगा !!

मेरे भारत तू ही बता दे, कब रीत ये तोड़ी जाएगी !
अन्न उगाने वालों के घर, ना भूख से मौतें आएगी !!

मेरे भारत तू ही बता दे, कब ये शोषण बंद होगा !
कब मजदूर-किसानों के जीवन में आनंद होगा !!

मेरे भारत तू ही बता दे, इंक़लाब कब आएगी !
सदियों से शोषित-कुचली जनता, कब हुंकार लगाएगी !!

मेरे भारत तू ही बता दे, कब यहाँ ऐसा आलम होगा !
किसी के पास न बहुत अधिक, और किसी के पास न कम होगा !!

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अब भगवान न आने वाले…

बन अर्जुन गांडीव उठा ले,
खुद गीता के श्लोक तू गा ले !
हक़ के लिए तुझे लड़ना है
अब भगवान न आने वाले !!

गद्दारों ने जब से राज संभाला,
देश का निकल गया दिवाला !
बेच रहे ईमान सडकों पे,
उठ कर के ये देश बचा ले !!
हक़ के लिए तुझे लड़ना है,
अब भगवान न आने वाले !!

भूख से बच्चे मर जाते है,
पर अन्न गोदाम में सड़ जाते है !
हक़ के लिए ये लड़े नहीं पर,
धर्म के नाम पे लड़ जाते है !!
धर्म के नाम पे भटकी भीड़ को,
बढ़ कर सच्चा राह दिखा ले !
हक़ के लिए तुझे लड़ना है
अब भगवान न आने वाले !!

हर मज़दूर-किसान का जीवन,
भूखा पेट और नंगा है तन !
शोषण की चक्की में पिस के,
बना हैं पूंजीपति का सेवन !
इस शोषण का तोड़ चक्रव्यूह,
समानता का नियम बना ले !
हक़ के लिए तुझे लड़ना है
अब भगवान न आने वाले !!

अब ना धृत क्रीड़ा का चलन हो,
ना द्रोपदी का चीड़ हरण हो !
अब अत्याचारी अठ्ठाहस करे ना,
ना किसी अभिमन्यु का मरण हो !!
तोड़ दे सारे दुष्चक्रों को,
सफल ना हो शकुनि की चालें !
हक़ के लिए तुझे लड़ना है
अब भगवान न आने वाले !!

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ये मत पूछो….

Ye Mat Puchho

तुम बिन वर्षों बीत गए,
पर कैसे बीते, ये मत पूछो !
नींद न आई इन अँखियों में,
फिर भी हमने, रात बिताई !!
बीत गई, ये रैना भी तुम बिन,
पर कैसे बीती, ये मत पूछो !!!

तुम बिन ये सावन भी आया,
अँखियों ने रिम-झिम बरसाया !
बिन साजन, ये दिल मुरझाया,
लेकिन ये सावन भी बीता,
पर कैसे बीता, ये मत पूछो !!!

राह तुम्हारी तकते रहे हम,
नाम तुम्हारा जपते रहे हम !
पर तुम तक आवाज़ न पहुंची,
हर पल तुम बिन, मरते रहे हम !!
हम तुमसे बिछड़ कर, मर भी न सके,
पर कैसे जिए, ये मत पूछो !!!

तुमसे बिछड़ के रहना था मुश्किल,
दर्द-ए-जुदाई सहना था मुश्किल !
फिर भी बिछड़ के रहते रहे हम,
दर्द जिगर का सहते रहे हम !!
पर कैसे सहे, ये मत पूछो !!

तुम बिन वर्षों बीत गए,
पर कैसे बीते, ये मत पूछो !
पूछ लो सारी बातें मुझसे,
पर तुम बिन थे कैसे, ये मत पूछो !!
तुम बिन वर्षों बीत गए,
पर कैसे बीते, ये मत पूछो !!!

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